01 तुलसीदास दोहावली
दोहों की सप्रसंग व्याख्या
1.
श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुबर विमल जसु, जो दायकु फल चारि ॥
शब्दार्थ - चरन = पैर। सरोज कमल। रज धूल। मुकुरु दर्पण। बरनऊँ वर्णन करूँ। विमल = निर्मल,
उज्ज्वल । जसु = यश । दायकु देने वाले। फल चारि
चार फल-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा तुलसीदास द्वारा रचित 'दोहावली' से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी
पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित है। यह दोहा हनुमान चालीसा का
प्रारंभिक दोहा है। इस दोहे में गुरु वंदना के बाद श्रीराम के पवित्र चरित्र के
गुणगान करने की कवि ने कामना की है।
व्याख्या - कवि कहता है कि मैं श्री गुरु महाराज के चरण कमलों की धूल
से अपने मनरूपी दर्पण को स्वच्छ और पवित्र करके श्री रघुवीर रामजी के निर्मल
पवित्र यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फलों धर्म,
अर्थ, काम और मोक्ष की देने वाला है।
विशेष - (1) कवि अपने सद्गुरु
की कृपा प्राप्त कर श्रीराम के उज्ज्वल चरित्र का गुणगान करने की कामना कर रहा है।
(2) भाषा ब्रज मिश्रित अवधी, दोहा छंद, अनुप्रास, उपमा तथा रूपक अलंकार हैं।
2.
राम नाम मनी दीप धरु, जीह देहरी द्वार।
तुलसी
भीतर बाहरु हुँ, जौ चाहसि उजियार ।
शब्दार्थ - मनी = मणियाँ। दीप दीपक। जीह जीभ। देहरी दहलीज। चाहसि
चाहता है। उजियार = उजाला।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा तुलसीदास द्वारा रचित 'दोहावली' से लिया गया है, जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित है. जिसमें कवि ने श्रीराम के नाम स्मरण की महिमा का वर्णन किया है।
व्याख्या- तुलसीदास जी कहते हैं कि हे मानव, तू राम नाम रूपी मणि दीपक को मुखरूपी द्वार की जीभरूपी
दहलीज पर रख। यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है। भाव यह है कि राम नाम
रूपी मणियों से बने दीपक को हृदय में धारण करने से अज्ञान रूपी अंधेरा नष्ट हो
जाता है तथा ज्ञान रूपी उजाला हो जाता है।
विशेष - (1) राम नाम के स्मरण से समस्त दोषों का नाश हो जाता है तथा हृदय के बाहर और भीतर
उजाला हो जाता है।
(2) ब्रज भाषा में अवधी के शब्दों का मिश्रण है। दोहा छंद,
रूपक अलंकार है।
3.
जड़ चेतन गुन दोषभय, बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि विकार ॥
शब्दार्थ - जड़ = निर्जीव । चेतन सजीव। बिस्व संसार। करतार ईश्वर
परमात्मा। गहहिं लेकर। पय = दूध। परिहरि = छोड़कर। बारि = पानी। विकार बुराई।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा तुलसीदास द्वारा रचित 'दोहावली' में से लिया गया है, जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में
संकलित है. जिसमें कवि ने संतों की विशेषता का वर्णन किया है।
व्याख्या - तुलसीदास कहते हैं कि परमात्मा ने इस जड़ चेतन संसार की गुण और दोष से युक्त
बनाया है, परंतु संत हँसों के समान नीर-शीर विवेकी होने
के कारण दोष रूपी जल को त्याग कर गुण रूपी दूध को ग्रहण करते हैं।
विशेष - (1) संत सदा सद्गुणों से युक्त होते हैं। वे
विकारों से रहित होते हैं।
(2) अवधी भाषा, दोहा छंद, अनुप्रास तथा रूपक
अलंकार का प्रयोग सराहनीय है।
4.
प्रभु तरुतर कपि डार पर, ते किए आपु समान।
तुलसी कहुँ न राम से, साहिब सील निधान ॥
शब्दार्थ - तरुतर = वृक्ष के नीचे। कपि वानर। आयु = अपने।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा तुलसीदास के द्वारा रचित 'दोहावली' से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी
पुस्तक -10’ में संकलित है। इस दोहे में कवि ने श्रीराम द्वारा वानरों को दिए गए
सम्मान का वर्णन किया है।
व्याख्या - कवि कहता है कि प्रभु श्री राम जी तो वृक्षों
के नीचे और बंदर वृक्षों की डालियों पर रहते थे, परंतु ऐसे बंदरों को भी उन्होंने अपने समान बना लिया।
तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरामजी जैसे शीलनिधान स्वामी अन्य किसी स्थान पर कहीं
भी नहीं हैं।
विशेष - (1) श्रीराम की सबके
प्रति समतावादी दृष्टि का उल्लेख किया गया है। वे कोई भी भेदभाव न करते हुए सबको
अपने समान बना लेते थे।
(2) अवधी भाषा, दोहा छंद, अनुप्रास अलंकार है।
5.
तुलसी ममता राम सो, समता सब संसार।
राग न रोष न दोष दुःख, दास भए भव पार ॥
शब्दार्थ - ममता = स्नेह, प्रेम। समता बराबर। राग प्रेम। रोष = क्रोध। भव = संसार।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा तुलसीदास द्वारा रचित 'दोहावली' से लिया गया हैजो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी
पुस्तक -10’ में संकलित है। इस दोहे में कवि ने श्रीराम के प्रति आस्था रखने तथा
सांसारिक प्राणियों से समभाव रखने की प्रेरणा दी है।
व्याख्या - तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीराम से ममता रखो तथा संसार के प्राणियों के
प्रति समभाव रखो, इससे मनुष्य राग,
रोष, दोष, दुःख से मुक्त हो जाता है तथा श्रीराम का दास
होने के कारण इस संसार रूपी सागर से पार हो जाता है।
विशेष - (1) सांसारिक माया-मोह
के बंधनों से मुक्त होकर भव सागर पार करने के लिए श्रीराम के प्रति ममता होनी आवश्यक है।
(2) अवधी भाषा, दोहा छंद, अनुप्रास तथा रूपक अलंकार हैं।
6.
गिरिजा संत समागम सम, न लाभ कछु आन।
बिनु हरि कृपा न होइ सो, गावहिं वेद पुरान ॥
शब्दार्थ - गिरिजा = पार्वती। सम समान। आन अन्य, दूसरा।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा तुलसीदास द्वारा रचित 'दोहावली' से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी
पुस्तक -10’ में संकलित है। इस दोहे में कवि ने संत समागम की महिमा का वर्णन किया
है।
व्याख्या - कवि कहता है कि शिव जी पार्वती को संतों के सम्मेलन की महिमा का वर्णन करते
हुए कहते हैं कि हे पार्वती, संतों के साथ मिल
बैठकर उनके विचार सुनने के समान संसार में अन्य कुछ भी लाभकारी नहीं है तथा संत
समागम भी श्रीराम की कृपा के बिना नहीं मिलता। ऐसा वेद-पुराणों में भी कहा गया है।
विशेष - (1) संत समागम प्रभु
कृपा से प्राप्त होता है तथा इसके समान लाभदायक संसार में और कुछ भी नहीं है।
(2) भाषा अवधी, दोहा छंद तथा अनुप्रास अलंकार हैं।
7.
पर सुख संपत्ति देखि सुनि, जरहिं जे जड़ बिनु आगि।
तुलसी तिन के भाग ते, चलै भलाई भागि ॥
शब्दार्थ - पर = पराया, दूसरे का। जरहिं जलना, ईप्यों करना। जड़
मूर्ख। भाग भाग्य। भागि भाग जाना, चले जाना।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा तुलसीदास द्वारा रचित 'दोहावली' से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी
पुस्तक -10’ में संकलित है, जिसमें कवि ने
ईर्ष्यालु व्यक्ति की दुर्दशा का वर्णन किया है।
व्याख्या - गोस्वामी तुलसी दास कहते हैं कि दूसरे के सुख और संपत्ति को देख-सुन कर जो
मूर्ख बिना आग के ही जलते रहते हैं, उन लोगों के भाग्य से भलाई स्वयं ही भाग जाती है। भाव यह है कि दूसरों की
उन्नति को देखकर ईर्ष्या करने वाले व्यक्ति का कभी भी भला नहीं होता है।
विशेष - (1) ईर्ष्यालु व्यक्ति का कभी भी भला नहीं होता है
और न ही सुख की प्राप्ति होती है।
(2) भाषा अवधी-ब्रज का मिश्रण, दोहा छंद, अनुप्रास अलंकार
हैं।
8.
सचिव वैद गुरु तीनि जो, प्रिय बोलहिं भयु आस।
राज, धर्म, तन तीनि कर, होड़ बेगिही नास ।।
शब्दार्थ - सचिव = मंत्री । वैद वैद्य। प्रिय बोलहिं मीठा बोलना,
मुँह देखी बोलना। भयु = डर से। तीनि = तीनों। बेगिही =
शीघ्र ही। नास नाश, विनाश।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा तुलसीदास द्वारा रचित 'दोहावली' से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी
पुस्तक -10’ में संकलित है, जिसमें कवि ने राजा
के भय से उसकी हाँ में हाँ मिलाने वाले चापलूसों के परिणाम का वर्णन किया है।
व्याख्या - कवि कहता है कि यदि किसी राजा का मंत्री, वैद्य और गुरु-ये तीनों राज-भय से अथवा किसी लोभ-लालच से
उसकी बात जैसी है वैसी ही मान लेते हैं अथवा उसकी हाँ में हाँ मिलाते हैं तो उसके
राज्य, धर्म और शरीर तीनों का शीघ्र ही विनाश हो जाता
है।
विशेष - (1) तुलसी दास का मानना
है कि रावण के भय से उसके सभासद सदा उसकी हाँ में हाँ मिलाते थे, इसलिए उसका विनाश हो गया था। इसलिए ऐसे चापलूसों से
बचना चाहिए।
(2) भाषा अवधी और ब्रज है। दोहा छंद तथा अनुप्रास अलंकार है।
9.
साहब ते सेवक बड़ो, जो निज धरम सुजान।
राम बाँध उतरै उद्धि, लांघि गए हनुमान ।।
शब्दार्थ - साहब = स्वामी। उद्धि समुद्र। बाँध पुल। सुजान निपुण ।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा तुलसीदास द्वारा रचित दोहावली से लिया गया
है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित है , जिसमें कवि ने भगवान् से अधिक उनके भक्त को प्रशंसा की है।
व्याख्या - कवि
कहता है कि स्वामी से तो वह सेवक बड़ा होता है जो अपने धर्म के पालन को करने में
निपुण होता है। इसीलिए स्वामी श्रीराम तो सागर पर पुल बंधने के बाद ही समुद्र पार
कर सके परंतु उनका सेवक हनुमान तो बिना पुल के ही समुद्र लांघ गया था।
विशेष - (1) स्वामी की कृपा से सेवक स्वामी से भी बड़ा काम कर सकता है।
(2) भाषा अवधी, ब्रज, दोहा छंद, अनुप्रास अलंकार
हैं।
10.
बिनु बिस्वास भगति नहिं, तेहि बिनु द्रवहिं न राम।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ, जीवन नहिं विश्राम।
शब्दार्थ - द्रवर्हि = द्रवित होना, पिघलना, दया करना। लह
प्राप्त करना, लेना।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा तुलसीदास द्वारा रचित 'दोहावली' से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी
पुस्तक -10’ में संकलित है। इस दोहे में कवि ने अपने आराध्य पर पूर्ण विश्वास रखते हुए
भक्ति करने का संदेश दिया है।
व्याख्या - कवि कहता है कि बिना भगवान् पर विश्वास किए उनकी भक्ति नहीं हो सकती। विश्वास
से रहित भक्ति से श्रीराम अपने भक्त पर दया नहीं करते और राम की कृपा के बिना
स्वप्न में भी जीवन में चैन नहीं मिलता है। भाव यह है कि विश्वासपूर्वक भक्ति करने
से ही परमात्मा की प्राप्ति होती है।
विशेष - (1) ईश्वर की भक्ति उस
पर पूर्ण विश्वास रख कर ही करनी चाहिए तभी ईश्वर की कृपा होती है।
(2) भाषा अवधी, ब्रज हैं। दोहा छंद
और अनुप्रास अलंकार है।
02
पदावली
पदों की सप्रसंग व्याख्या
1.
बसौ मेरे नैनन में नन्द लाल।
मोहनि मूरति साँवरी सूरति नैना बनै विसाल।
मोर मुकुट मकराकृत कुंडल अरुण तिलक दिये भाल।
अधर सुधारस मुरली राजति उर वैजन्ती माल।
छुद्र घंटिका कटि तट सोभित नुपूर शब्द रसाल।
मीरा प्रभु सन्तन सुखदाई भक्त बछल गोपाल ॥
शब्दार्थ - बसौ = निवास करो। नैनन नेत्र। नन्दलाल नंद के पुत्र
श्रीकृष्ण। मोहनि मोहित करने वाली,आकर्षित करने वाली।
मूरति आकृति। साँवरी = सांवले रंग की। विसाल बड़े-बड़े, विशाल। मकराकृत = मकर की आकृति के। अरुण = लाल। भाल माथा।
अधर होंठ। सुधारस अमृत रस। मुरली बांसुरी। राजति = सुशोभित होना। उर = हृदय। छुद्र
छोटी। कटि कमर। नुपूर घुँघरू। रसाल मीठा, मोहक, मधुर। बछल = रक्षक, वत्सल ।
प्रसंग - प्रस्तुत पद मीराबाई द्वारा रचित ‘पदावली’ से लिया गया है जो
कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित है। इस पद में
कवयित्री ने बाल कृष्ण की मनोहारी छवि का वर्णन करते हुए उसे अपने नेत्रों में
बसाने का वर्णन किया है।
व्याख्या - कवयित्री अपनी कामना व्यक्त करते हुए कहती है कि हे नंद के पुत्र श्री कृष्ण,
आप मेरे नेत्रों में निवास करने की कृपा करो। आपकी
मोहित करने वाली आकृति तथा सांवले रंग की सूरत है। आपके नेत्र बहुत बड़े-बड़े हैं।
आप ने मोर के पंखों का मुकुट सिर पर और कानों में मकर की आकृति के कुंडल धारण किए हुए
हैं। आपके माथे पर लाल रंग का तिलक सुशोभित हो रहा है। आप के होठों पर अमृत समान
मधुर स्वर रस की वर्षा करने वाली बाँसुरी तथा हृदय पर वैजंती माला विराजमान है।
छोटी-छोटी घंटियाँ आप की कमर पर बंधी हुई हैं तथा पैरों में घुँघरू बंधे हैं जिनकी
मधुर गुंजार सुनाई दे रही है। मीरा के प्रभु संतों को सुख प्रदान करते हैं तथा अपन
भक्तों की सदा रक्षा करते हैं।
विशेष - (1) कवयित्री ने
श्रीकृष्ण के बालरूप को संतों के लिए सुखदायी तथा भक्तों की रक्षा करने वाला मानते
हुए उन्हें इसी रूप में अपने नेत्रों में बसने की कामना व्यक्त की है।
(2) भाषा सहज, सरस, भावपूर्ण राजस्थानी शब्दों से युक्त है।
अनुप्रास अलंकार तथा गेयता का गुण विद्यमान है।
2. मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।
तात मात भ्रात बंधु, आपनो न कोई।
छांड़ि दई कुल की कानि, कहा करें कोई।
संतन ढिग बैठि बैठि, लोक लाज खोई।
अँसुअन जल सींचि सींचि, प्रेम बेलि बोई।
अब तो बेलि फैल गई, आनंद फल होई।
भगत देखि राजी भई, जगत देखि रोई।
दासी मीरा लाल गिरधर, तारौ अब मोही।
शब्दार्थ - गिरिधर = गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले श्रीकृष्ण।
दूसरो अन्य। जाके जिसके। पति = स्वामी,
पति। छांड़ि = त्यागना, छोड़ना। दई दी। कानि मर्यादा। कहा क्या। करिहै करेगा। ढिग
पास, निकट। सीचि = सींचना। आणंद = आनंद। राजी
प्रसन्न। जगति संसार। तारो उद्धार करना, मुक्ति देना।
प्रसंग - प्रस्तुत पद मीराबाई की पदावली से अवतरित किया गया है जो
कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित है। इसमें कवयित्री ने
भगवान् श्रीकृष्ण को अपने पति रूप में मानकर उनके प्रति अपनी अनन्य भक्ति भावना का
परिचय दिया है।
व्याख्या - मीरा जी कहती हैं
कि मेरा तो सर्वस्व गोवर्धन पर्वत धारी श्रीकृष्ण हैं। उनके अतिरिक्त मेरा किसी से
कोई संबंध नहीं। मोर-मुकुट धारण करने वाले श्रीकृष्ण ही मेरे पति हैं। पिता,
माता, भाई, सगा-संबंधी इनमें अब मेरा अपना कोई नहीं है। मैंने अपने परिवार की मान-मर्यादा को
छोड़ कर उन्हें अपना लिया है। इसलिए मेरा अब कोई क्या कर सकता है अर्थात् मुझे
किसी की परवाह नहीं है। मैं लोक-लाज की चिंता छोड़कर संतों के पास बैठती हूँ।
मैंने आँसुओं के जल से सींच-सोंच कर कृष्ण प्रेम की बेल को बोया है। अभिप्राय यह
है कि श्रीकृष्ण के प्रति मीरा के मन की प्रेम रूपी बेल का विकास हो चुका है। अतः
अब उसे किसी प्रकार से भी नष्ट नहीं किया जा सकता। मीरा जी कहती हैं कि वे प्रभु
भक्त को देख कर तो प्रसन्न होती हैं पर संसार को देखकर रो पड़ती हैं। भाव यह है कि
माया-मोह में लिप्त प्राणियों के दयनीय अंत की कल्पना मात्र से मीरा का हृदय दुःख
से भर जाता है। मीरा स्वयं को श्रीकृष्ण की दासी मानती हुई उनसे अपने उद्धार की
प्रार्थना करती है।
विशेष - (1) मीरा श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित है। उन्हें वह
अपने पति रूप में मानती है। वह उनसे अपने उद्धार की प्रार्थना करती है।
(2) ब्रज मिश्रित राजस्थानी भाषा का प्रयोग है। अनुप्रास अलंकार
है।
03
नीति के दोहे
दोहों की सप्रसंग व्याख्या
1.
कहि रहीम सम्पति सगे, बनत बहुत बहु रीत।
विपत कसौटी जे कसे, सोई साँचै मीत।।
शब्दार्थ- कहि = कहते हैं। सम्पति धन-दौलत। सगे सगे-संबंधी। बनत =
बनते हैं। बहु = अनेक । रीति = प्रकार। विपत = मुसीबत। जे जो। कसौटी कसे कसौटी पर
खरा उतरना। सोई वही। साँचे सच्चा। मीत = मित्र।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा रहीम द्वारा रचित 'नीति के दोहे' पाठ में से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’
में संकलित है। इस दोहे में कवि ने सच्चे मित्र के लक्षण बताये हैं।
व्याख्या - रहीम जी कहते हैं
कि जब पास में धन-दौलत होती है तो अनेक प्रकार से लोग हमारे सगे-संबंधी-मित्र आदि
बन जाते हैं परंतु जो मुसीबत रूपी कसौटी पर कसे जाने के समय साथ देता है वही सच्चा
मित्र होता है।
विशेष - (1) कठिनाई में काम आने
वाले ही सच्चा मित्र होता है।
(2) भाषा सरल, सरस, सहज और दोहा छंद है। अनुप्रास अलंकार है।
2.
एकै साधे सब सधै, सब साधै सब जाय।
रहिमन सींचे मूल को, फूलै फलै अधाय ।।
शब्दार्थ - मूल = जड़। फूलै फूल आना। फलै फल आना। अधाय तृप्त होना।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा रहीम
जी द्वारा रचित 'नीति के दोहे'
में से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य
पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित है। इस दोहे में कवि ने एकनिष्ठ भाव से एक
की आराधना करने पर बल दिया है।
व्याख्या - कवि कहता है कि एकनिष्ठ भाव से एक ईश्वर की आराधना करने से सब को साथ लिया
जाता है जबकि सब की साधना करने से सभी हाथ नहीं आते अथवा सब कुछ नष्ट हो जाता है।
रहीम जी उदाहरण देकर समझाते हैं कि जैसे किसी वृक्ष की जड़ को सींचने से वह
फलता-फूलता है तथा उसके फलों को खा कर सब तृप्त हो जाते हैं।
विशेष - (i) अपना ध्यान एक
लक्ष्य की ओर केंद्रित करने से ही सफलता की प्राप्ति होती है।
(ii) भाषा सहज, सरल, भावानुकूल तथा दोहा
छंद है। अनुप्रास अलंकार है।
3.
तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान।
कहि रहीम पर काज हित, सम्पति संचहिं सुजान ।।
शब्दार्थ - तरूवर = वृक्ष, पेड़। खात खाना। सरवर तालाब। पान पानी। परकाज परोपकार, दूसरे की भलाई। हित = के लिए। संचहिँ एकत्र करना। सुजान
अच्छे लोग, सज्जन।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा रचित 'नीति के दोहे' से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित
है। इस दोहे में कवि ने परोपकार की महत्ता पर प्रकाश डाला है।
व्याख्या - कवि कहता है कि वृक्ष कभी भी अपने फल नहीं खाता और तालाब भी अपना जल कभी नहीं
पीता। रहीम जी कहते हैं कि दूसरों की भलाई के लिए ही सज्जन धन-दौलत एकत्र करते
हैं।
विशेष - (1) मनुष्य को अपनी
धन-संपत्ति का सदुपयोग दूसरों की भलाई के लिए करना चाहिए।
(2) भाषा सरल, सरस, दोहा छंद तथा अनुप्रास अलंकार है।
4.
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवे सुई, का करे तरवारि ।।
शब्दार्थ - लघु = छोटा, तुच्छ। तरवारि = तलवार।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा रहीम जी द्वारा रचित 'नीति के दोहे' से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित
है। इस दोहे में कवि ने कहा है कि हमें छोटी वस्तु के महत्त्व को भी अनदेखा नहीं करना
चाहिए।
व्याख्या - रहीम जी कहते हैं कि किसी बड़े व्यक्ति अथवा वस्तु को
देखकर हमें छोटे व्यक्ति अथवा वस्तु को छोड़ नहीं देना चाहिए अथवा उसका तिरस्कार
नहीं करना चाहिए क्योंकि आवश्यकता के समय जहाँ सुई काम आती है, वहाँ तलवार किसी काम नहीं आती।
विशेष - (1) हमें बड़ी वस्तु
अथवा संपन्न व्यक्ति को देखकर छोटी वस्तु अथवा निर्धन व्यक्ति की उपयोगिता को भूलना नहीं चाहिए।
दोनों का सम्मान करना चाहिए।
(2) भाषा सरल, भावानुरूप, दोहा छंद तथा अनुप्रास अलंकार है।
5. कनक-कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय।
बह खाये बौरात है, इहिं पाये बौराय।।
शब्दार्थ - कनक = धतूरा, सोना। मादकता =
नशा। बौराय पागल हो जाता है।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा बिहारी द्वारा रचित 'नीति के दोहे' से लिया गया है जो
कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित है , जिसमें कवि ने यह
बताया है धन और वैभव का नशा मनुष्य को पागल बना देता है। धनी व्यक्ति नशा करने
वाले व्यक्ति की तरह व्यवहार करने लगता है।
व्याख्या - महाकवि बिहारी कहते हैं कि धतूरे की तुलना में स्वर्ण में
सौगुना अधिक नशा होता है क्योंकि धतूरे को खाने पर नशा होता है जबकि सोने के
प्राप्त होने पर ही नशा हो जाता है। जो नशा धतूरा खाने पर होता है, उससे कहीं अधिक नशा धन-वैभव के प्राप्त होने पर
होता है।
विशेष - (1) धन-संपत्ति पाकर
मनुष्य अहंकारी बन जाता है।
(2) दोहा छंद, ब्रज भाषा तथा यमक
अलंकार है।
6. इहि आशा अटक्यो रहै, अलि गुलाब के मूल।
हो इहै बहुरि बसन्त ऋतु, इन डारनि पै फूल ।।
शब्दार्थ - इहि = इस। अलि भँवरा। मूल जड़। होइहै हो जाएगी। बहुरि =
फिर।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा बिहारी द्वारा रचित 'नीति के दोहे' से लिया गया है जो
कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित है। इस दोहे में कवि
ने मनुष्य को सदा
आशावादी रहने का संदेश दिया है।
व्याख्या - कवि कहता है कि फूल न होने पर भी इस उम्मीद से भँवरा गुलाब की जड़ के पास
रहता है कि फिर से बसंत ऋतु आएगी और इन डालियों पर फूल खिल जाएँगे। भाव यह है कि
मनुष्य को कभी निराश नहीं होना चाहिए क्योंकि दुःख के बाद सुख आता ही है।
विशेष - (1) कवि ने मनुष्य को
अपना कर्म करते हुए निरन्तर आशावादी बने रहने का संदेश दिया है।
(2) ब्रज भाषा, दोहा छंद तथा
अनुप्रास अलंकार है।
7. सोहतु संगु समानु सो, यहै कहै सब लोग।
पान पीक ओठनु बनें, नैननु काजर जोग।।
शब्दार्थ - सोहतु = शोभामान होता है। संगु साथ। यहै यही। काजर काजल ।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा बिहारी द्वारा रचित 'नीति के दोहे' से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित
है। इस दोहे में कवि बताता है कि एक जैसे स्वभाव वालों का साथ सदा बना रहता है।
व्याख्या - कवि कहता है कि एक जैसे स्वभाव वाले लोगों का साथ ही सदा रहता है ऐसा ही सब
लोग भी कहते हैं क्योंकि पानी की पीक की लालिमा सदा ओंठों पर तथा काजल आँखों में
सुशोभित होता है। पान की पीक की लालिमा ओंठों के लिए तथा काजल आँखों के लिए बना
है।
विशेष - (1) समान प्रकृति तथा स्वभाव के व्यक्तियों का साथ
सदा बना रहता है।
(2) ब्रज भाषा, दोहा छंद तथा अनुप्रास अलंकार है।
8.
गुनी गुनी सबकै कहैं, निगुनी गुनी न होतु।
सुन्यौ कहूँ तरू अरक तें, अरक-समान उदोतु ।।
शब्दार्थ - गुनी = गुणवान। कहैं कहने से। निगुनी = गुणहीन। तरू वृक्ष।
अरकतें आक के। अरक-समान = सूर्य के समान। उदोतु = प्रकाशवान ।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा बिहारी द्वारा रचित 'नीति के दोहे' से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित
है। इस दोहे में कवि ने स्पष्ट किया है कि कहने मात्र से ही गुणहीन व्यक्ति गुणवान नहीं
हो सकता।
व्याख्या - कवि कहता है कि सब लोगों के द्वारा किसी गुणहीन व्यक्ति को बार-बार गुणवान
कहने से वह गुणहीन व्यक्ति गुणवान नहीं बन सकता क्योंकि कहीं यह नहीं सुना कि आक
के वृक्ष में भी सूर्य के समान तेज तथा उजाला है। जैसे आक कहने से आक का वृक्ष अरक
अर्थात् सूर्य नहीं हो सकता वैसे ही गुणहीन को गुणी-गुणी कहते रहने से वह गुणवान
नहीं हो सकता है।
विशेष - (1) गुणहीन को गुणी
कहते रहने से उसे गुणवान नहीं बनाया जा सकता।
(2) ब्रज भाषा, दोहा छंद, अनुप्रास तथा
पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
9.
करत करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान ।।
शब्दार्थ - जड़मति = मूर्ख। सुजान विद्वान्, बुद्धिमान। रसरी रस्सी। सिल पत्थर, चट्टान।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा वृन्द द्वारा रचित 'नीति के दोहे' से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित
है। इस दोहे में कवि ने यह बताया है कि अभ्यास करने से मूर्ख भी विद्वान् बन सकता
है।
व्याख्या - कवि कहता है कि बार-बार अभ्यास करने से मूर्ख व्यक्ति भी विद्वान् बन सकता है
जैसे बार-बार रस्सी के घिसने से पत्थर पर भी निशान पड़ जाते हैं।
विशेष - (1) परिश्रम करने से व्यक्ति अपने लक्ष्य को अवश्य
प्राप्त कर लेता है।
(2) भाषा अत्यंत सरल, भावपूर्ण, दोहा छंद और
पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
10.
फेर न हुवै है कपट सों, जो कीजै व्यापार।
जैसे हाँडी काठ की, चढ़े न दूजी बार।।
शब्दार्थ - फेर = दुबारा। हुवै फिर से होना। कपट छल। काठ लकड़ी। दूजी
= दूसरी।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा वृन्द द्वारा रचित 'नीति के दोहे' से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित
है। इस दोहे में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि छल-कपट का व्यवहार बार-बार नहीं चलता
है।
व्याख्या - कवि कहता है कि यदि कोई व्यक्ति छल-कपट और चालाकी से अपना कार्य करता है तो
उसकी चालाकी एक बार तो चल जाती है परंतु बार-बार नहीं चलती जैसे काठ की हांडी एक
बार तो चढ़ जाती है परंतु दोबारा नहीं चढ़ सकती।
विशेष - (1) छल-कपट का व्यवहार
बार-बार नहीं चलता है।
(2) भाषा सरल, भावपूर्ण, दोहा छंद है।
11.
मधुर वचन ते जात मिट, उत्तम जन अभिमान।
तनिक सीत जल सों मिटे, जैसे दूध उफान ।।
शब्दार्थ - मधुर = मीठे। वचन = शब्द, वाणी। अभिमान घमंड, अहंकार। तनिक थोड़े से। सीत = ठंडा। उफान = उबाल।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा वृन्द द्वारा रचित 'नीति के दोहे' से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित
है। इस दोहे में कवि ने मधुर वाणी के प्रभाव का वर्णन किया है।
व्याख्या - कवि कहता है कि मधुर वचनों अथवा मीठी वाणी के बोलों से किसी भी अभिमानी
व्यक्ति के गर्व को उसी प्रकार से शांत किया जा सकता है जैसे थोड़े से ठंडे पानी
के छींटों से उबलते हुए दूध के उफ़ान को कम कर लिया जाता है।
विशेष - (1) मधुर वाणी के प्रयोग से क्रोधी व्यक्ति के
क्रोध तथा अभिमानी के गर्व को भी शांत किया जा सकता है।
(2) भाषा सरल, सहज, भावपूर्ण तथा दोहा छंद है।
12.
अरि छोटो गनिये नहीं, जाते होत बिगार।
तृण समूह को तनिक में, जारत तनिक अंगार।।
शब्दार्थ - अरि = शत्रु, दुश्मन। गनिये मानना, गिनना। बिगार
बिगड़ना। तृण तिनका। तनिक = क्षण भर में। जारत = जलाना। तनिक छोटा-सा। अंगार आग का
अंगारा।
प्रसंग - प्रस्तुत दोहा वृन्द द्वारा रचित 'नीति के दोहे' से लिया गया है जो
कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित है। इस दोहे में कवि
ने संदेश दिया है कि अपने छोटे-से-छोटे शत्रु को भी कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए।
व्याख्या - कवि कहता है कि अपने शत्रु को कभी भी छोटा, तुच्छ या अपने से कमजोर नहीं समझना चाहिए क्योंकि इस से
बहुत हानि हो जाती है। जिस प्रकार तिनकों के ढेर को आग का केवल एक अंगारा क्षणभर
में जला कर नष्ट कर देता है वैसे ही शत्रु को कम समझने से हानि होती है।
विशेष - (1) कभी भी किसी कार्य अथवा शत्रु को अपने से कम
नहीं समझना चाहिए।
(2) भाषा सहज, सरल, भावपूर्ण, दोहा छंद और अनुप्रास अलंकार है।
04
हम राज्य लिए मरते हैं
पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या
1. हम राज्य लिए मरते हैं।
सच्चा राज्य परन्तु हमारे कर्षक ही करते हैं।
जिनके खेतों में है अन्न,
कौन अधिक उनसे सम्पन्न ?
पत्नी-सहित विचरते हैं वे, भव वैभव भरते हैं,
हम राज्य लिए मरते हैं।
शब्दार्थ - मरते हैं = झगड़ते हैं, दुःखी होते हैं। कर्षक कृषक, किसान। सम्पन्न धनी। विचरते = चलते-फिरते। भव = संसार। वैभव
धन-संपत्ति, ऐश्वर्य।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कविता 'हम राज्य लिए मरते हैं' से ली गई हैं जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक
-10’ में संकलित है, जिसमें उर्मिला
राज्य में व्याप्त गृह कलह से दुःखी हो कर किसानों के शांतिपूर्ण जीवन की प्रशंसा
कर रही है।
व्याख्या - उर्मिला कहती है कि हम तो राज्य के कारण गृह कलह से दुःखी हैं जबकि सच्चा
राज्य तो हमारे राज्य के वे किसान करते हैं जिन के खेतों में अन्न पैदा होता है।
उन से अधिक धनवान भला और कौन हो सकता है ? अर्थात् सबसे दुखी तथा सम्पन्न अन्न उत्पन्न करने वाले किसान ही हैं। वे अपनी
पत्नी के साथ घूमते-फिरते हुए संसार के ऐश्वर्य का उपभोग करते हैं, जबकि हम राज्य के लिए आपसी कलह से मर रहे हैं।
विशेष - (1) किसानों को सबसे सुखी माना है क्योंकि वे स्वयं अन्न पैदा कर स्वतंत्रतापूर्वक
अपना जीवन व्यतीत करते हैं जबकि राजवंशी राज्य के कलह से ही त्रस्त हैं।
(2) भाषा तत्सम प्रधान, भावपूर्ण है।
2.
वे गोधन के धनी उदार,
उनको सुलभ सुधा की धार,
सहनशीलता के आगर वे श्रम सागर तरते हैं।
हम राज्य लिए मरते हैं।
शब्दार्थ - गोधन = गायों रूपी धन। उदार सरल, दानी। सुधा अमृत। आगर भंडार, खजाना। श्रम = मेहनत, परिश्रम। सागर समुद्र ।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कविता 'हम राज्य लिए मरते हैं' से ली गई हैं, जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित है , जिसमें
उर्मिला राज्य के लिए गृह कलह से दुःखी होकर किसानों के संपन्न जीवन की प्रशंसा
करती है।
व्याख्या - उर्मिला किसानों की प्रशंसा करते हुए कहती हैं कि किसान के पास गायों रूपी धन
है, जिसके कारण वे धनवान और उदार बने रहते हैं।
उन्हें अमृत की धारा के समान गाय के दूध की धारा आसानी से मिल जाती है। वे
सहनशीलता के भंडार हैं तथा निरंतर परिश्रम रूपी सागर में तैरते रहते हैं अर्थात्
वे सदा मेहनत करते रहते हैं, जबकि हम लोग राज्य के
लिए परस्पर लड़ते-मरते रहते हैं।
विशेष - (1) किसान गायों रूपी धन से अमीर हैं तथा निरंतर
परिश्रम करते रहते हैं।
(2) भाषा तत्सम प्रधान, अनुप्रास तथा रूपक अलंकार हैं।
3.
यदि वे करें, उचित है गर्व,
बात बात में उत्सव-पर्व,
हम से प्रहरी रक्षक जिनके, वे किससे डरते हैं ?
हम राज्य लिए मरते हैं।
शब्दार्थ - उचित = सही है। गर्व घमंड। उत्सव समारोह। पर्व त्योहार।
प्रहरी पहरेदार। रक्षक = रखवाले।
प्रसंग - यह काव्यांश कविवर 'मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित 'हम राज्य लिए मरते हैं' कविता से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी
पुस्तक -10’ में संकलित है। इसमें उर्मिला ने किसानों के जीवन को अपने राज्य के
लिए कलह ग्रस्त जीवन से श्रेष्ठ माना है।
व्याख्या- उर्मिला कहती है कि यदि वे किसान अपने ऊपर गर्व
करते हैं तो उनका ऐसा करना बिलकुल ठीक भी है। वे हर अवसर पर समारोह करते हैं तथा
त्योहार मनाते हैं। जब हमारे जैसे पहरेदार उनके रक्षक हों तो भला वे किसी से क्यों
डरेंगे ? वे निडरतापूर्वक अपने समारोह तथा पर्व मनाते
हैं। इसके विपरीत हम लोग तो सदा राज्य के लिए हो मरते रहते हैं।
विशेष - (1) किसानों के आनंद एवं उल्लासमय जीवन की झलक
प्रस्तुत की गई है।
(ii) भाषा तत्सम प्रधान, पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
4. करके मीन मेख सब ओर,
किया करें बुध वाद कठोर,
शाखामयी बुद्धि तजकर वे मूल मूल धर्म धरते हैं।
हम राज्य लिए मरते हैं।
शब्दार्थ - मीन मेख = दोष निकालना, तर्क-वितर्क करना,
बहस करना। बुध बुद्धिमान, विद्वान्। वाद वाद-विवाद, बहस। शाखामयी बुद्धि व्यर्थ की बातें। तजकर
त्यागकर, छोड़कर। मूल धर्म वास्तविक धर्म, सहज धर्म। धरते धारण करना, पालन करना।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कविता 'हम राज्य लिए मरते हैं' से ली गई हैं, जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित है , जिसमें
उर्मिला ने किसानों के सहज जीवन की प्रशंसा करते हुए राज्य के लिए व्यर्थ ही
लड़ने-मरने वालों के जीवन' को व्यर्थ माना है।
व्याख्या - उर्मिला कहती है कि
विद्वान् लोग हर बात में दोष निकाल कर व्यर्थ में बहस करते रहते हैं, चाहे उस से कुछ प्राप्त हो या न हो परंतु किसान
इन व्यर्थ की बातों को त्यागकर सहज धर्म को अपनाते हैं। वे विद्वानों के चक्कर में न पड़कर धर्म
के वास्तविक स्वरूप को सहज रूप से अपनाते हैं जबकि हम राज्य के लिए आपस में ही
लड़ते-मरते रहते हैं।
विशेष - (1) आडंबरपूर्ण धर्म के स्थान पर धर्म के सहज
स्वरूप को अपनाना श्रेष्ठ है।
(2) भाषा तत्सम प्रधान और अनुप्रास अलंकार है।
5.
होते कहीं वही हम लोग,
कौन भोगता फिर ये भोग ?
उन्हीं अन्नदाताओं के सुख आज दुःख हरते हैं।
हम राज्य लिए मरते हैं।
शब्दार्थ - भोगता = उपभोग करना। भोग सुख। अन्नदाताओं किसानों। हरते
हैं दूर करते हैं।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित कविता 'हम राज्य लिए मरते हैं' से ली गई हैं, जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित है ,जिसमें
उर्मिला के राज्य के लिए गृह कलह करने वाले राज घराने से किसान के सहज जीवन को
श्रेष्ठ माना है।
व्याख्या - उर्मिला कहती है कि यदि कहीं हम भी किसान होते तो फिर राज्य की गृह कलह के
कारण उत्पन्न कष्टों को कौन सहन करता ? यदि हम भी किसान होते तो राज्य की उलझनों को सहज करने वाला भी तो कोई होना
चाहिए। उन्हीं अन्नदाता किसानों के सुखों को देखकर ही आज हमारे दुःख दूर हो रहे
हैं फिर भी हम राज्य के लिए लड़ते-मरते रहते हैं।
विशेष - (1) वास्तविक सुख किसान
के सरल जीवन में है, यह न समझ कर हम इस
अभिमान में लड़-मर रहे हैं कि राज्य हमारा है।
(2) भाषा तत्सम प्रधान और भावपूर्ण है।
05
गाता खग
पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या
1.
गाता खग प्रातः उठकर -
सुंदर, सुखमय जग-जीवन !
गाता खग संध्या तट पर -
मंगल, मधुमय जग-जीवन।
शब्दार्थ - खग = पक्षी । तट किनारा। मंगल कल्याण। मधुमय आनंदपूर्ण।
प्रसंग - यह काव्यांश 'सुमित्रानंदन पंत' द्वारा रचित 'गाता खग' से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी
पुस्तक -10’ में संकलित है। इसमें कवि पक्षियों के माध्यम से मानव के सुखद,
सुंदर तथा मंगलमय जीवन की कामना कर रहा है।
व्याख्या - कवि कहता है कि प्रभातकाल में आकाश में स्वतंत्र उड़ने वाले पक्षियों का कलरव
गान यही उपदेश देता है कि यह जीवन सौंदर्य और सुख का भंडार है। जिस प्रकार प्रभात
वेला में संपूर्ण प्रकृति अपनी सुंदरता, सरसता तथा शीतव्रता से जड़-चेतन को जीवन प्रदान कर देती है, उसी प्रकार पक्षियों का चहचहाना संगीत को भी
माधुर्य प्रदान करता है, जिससे संपूर्ण
विश्व सुखमय प्रतीत होता है। संध्या के समय जब संपूर्ण संसार विश्राम की ओर अग्रसर
होता है, उस समय किसी शून्य, एकांत नदी अथवा सरोवर के किनारों पर एकत्रित होकर पक्षी
पुनः चहकते हुए एकत्रित हो जाते हैं। उस समय उनका चहचहाना जीवन के मंगलमय रूप
माधुर्य को व्यक्त करता है। कवि को पक्षियों के स्वर में जीवन-संगीत सुनाई पड़ता
है।
विशेष - (1) कवि प्रभात तथा
संध्या के समय होने वाले पक्षियों के कलरव को मानव जीवन के लिए समृद्धि एवं कल्याण
का संदेश देने वाला मानता है।
(2) भाषा तत्सम प्रधान है। मानवीकरण तथा अनुप्रास
अलंकार हैं।
2.
कहती अपलक तारावलि
अपनी आँखों का अनुभव,
अवलोक आँख आँसू की
भर आती आँखें नीरव !
शब्दार्थ - अपलक = एकटक। तारावलि तारों की पंक्ति। अवलोक देखकर। नीरव
मौन, खामोश,चुपचाप ।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ
सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कविता 'गाता खग' से ली गई हैं जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी
पुस्तक -10’ में संकलित है। कवि आकाश में चमकने वाले तारों के माध्यम से मानव जीवन
में व्याप्त करुणा और संवेदना को व्यक्त कर रहा है।
व्याख्या - कवि कहता है कि अनंत आकाश में छाए हुए अंधकार में निरंतर चमकने वाली ताराओं
की पंक्तियाँ देखकर प्रतीत हो रहा है जैसे वह कह रही हों कि संपूर्ण जीवन करुणा
तथा दुःख से भरा हुआ है। जिस प्रकार निरंतर दुःख सहते हुए किसी की आँखों में से
आँसू बह जाते हैं और आँसुओं से भरी आँखों को देखकर दूसरे में सहानुभूति के कारण
करुणा का संचार हो जाता है, उसी प्रकार
विश्वव्यापी दुःख, अवसाद, विपन्नता और विषमता को देखकर अपलक ताराओं को
करुणा से भरी आँखों से आँसू छलक पड़ते हैं। आँखों की भाषा नीरव और मौन होती है।
केवल आँसुओं के माध्यम से ही प्रकट होती है।
विशेष - (1) कवि का मानना है कि
तारों की पंक्तियाँ टिमटिमाकर मानव के दुःख और आँसू देखकर ओस के रूप में स्वयं भी
आँसू बहाती है।
(2) भाषा तत्सम प्रधान है। मानवीकरण तथा अनुप्रास
अलंकार हैं।
3.
हँसमुख प्रसून सिखलाते
पल भर है, जो हँस पाओ,
अपने उर की सौरभ से
जग का आँगन भर जाओ !
शब्दार्थ - हँसमुख = प्रसन्न, खिले हुए। प्रसून पुष्प, फूल। उर हृदय। सौरभ
सुगंध । जग = संसार ।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कविता 'गाता खग' से ली गई हैं जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक
-10’ में संकलित है। कवि मानव को सदा खिले हुए फूलों की तरह मुस्कराते रहने का
संदेश दे रहा है।
व्याख्या - कवि कहता है कि प्रभातकाल में खिले हुए पुष्प अपनी कोमलता, मनोहरता और सौरभ से वातावरण को पूरी तरह भरते
हुए मानव को यह प्रेरणा देते हैं कि इस नाशवान और छोटे से जीवन को अनेक प्रकार की
विषमताओं और समस्याओं ने नीरस और उदास बना रखा है। यदि हो सके तो संसार में अपना
छोटा-सा जीवन प्रसन्नता और आनंद से व्यतीत करो।
मनुष्य अपने सद्गाओं और सद-कार्यों से जगत् के वातावरण को सरस और सुखद बनाने का
प्रयास करे तभी यह संसार सुख, संपदा और समृद्धि
पा सकेगा। जिस प्रकार फूल अपने सर्वस्व को समर्पित करके वातावरण की भव्यता बढ़ा
देते हैं उसी प्रकार मनुष्य भी अपने गुण, व्यवहार और कार्य-व्यापार से संसार के प्राणियों के जीवन को उन्नत बना सकता
है।
विशेष - (1) कवि खिले हुए पुष्पों के माध्यम से मनुष्य को
यह संदेश दे रहा है कि जैसे फूल खिल कर वातावरण को सुखद बना देते हैं उसी प्रकार
मनुष्य को भी संसार में सदा खुशियाँ बिखेरते हुए उसे खुशहाल बनाना चाहिए।
(2) भाषा तत्सम प्रधान है। मानवीकरण तथा रूपक
अलंकार विद्यमान हैं।
4.
उठ उठ लहरें कहतीं यह-
हम कूल विलोक न पाएँ,
पर इस उमंग में बह-बह
नित आगे बढ़ती जाएँ।
शब्दार्थ - कूल = किनीरा। विलौक देख। उमंग उत्साह। बह-बह = बहते हुए।
नित = सदा, हमेशा।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कविता 'गाता खग' से ली गई हैं जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक
-10’ में संकलित है। कवि ने सागर में उठती हुई लहरों के माध्यम से मनुष्य को
निरंतर अपना कर्म करते हुए लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी है।
व्याख्या - कवि कहता है कि
सरिता अथवा सागर की लहरें एक के बाद एक ऊपर उठ होकर किनारे की ओर बढ़ती रहती हैं।
लहरें देखती कि किनारा मिला अथवा नहीं किंतु वे उठती गिरती आगे बढ़ती ही रहती हैं।
कभी-कभी लहर मार्ग में ही बिखर जाती हैं किंतु उस समय उसके अनेक रूप किनारे 'की ओर बढ़ने लगते हैं। कवि का मानना है कि जिस
प्रकार आत्मा परमतत्व की प्राप्ति के लिए निरंतर गतिशील रहती है और भिन्न-भिन्न
शरीर धारण करती है। नष्ट होने पर फिर से नया शरीर पाकर आगे बढ़ती चलती है क्योंकि
उसमें परमतत्व को प्राप्त करने की लगन इतनी तेज होती है कि मार्ग के आकर्षण अथवा
बंधन उसे रोक नहीं पाते; उसी प्रकार लहरें
किनारे को प्राप्त करने की इच्छा से ही निरंतर गतिमान पथ पर चलती रहती हैं।
विशेष - (1) कवि ने लहरों की निरंतर गतिशीलता के माध्यम से
मनुष्य को यह संदेश दिया है कि लक्ष्य मिले या न मिले परंतु उसे प्राप्त करने के
लिए निरंतर कर्म करते रहना चाहिए।
(2) भाषा तत्सम प्रधान है। मानवीकरण, अनुप्रास तथा पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार हैं।
5.
कैंप कैंप हिलोर रह जाती-
रे मिलता नहीं किनारा।
बुद्बुद् विलीन हो चुपके पा जाता आशय सारा ।
शब्दार्थ - कॅप-कँप = सिहर उठना, काँपना। हिलोर लहर। बुद्युद् बुलबुले। विलीन मिट जाना,
नष्ट होना। चुपके चुपचाप, खामोशी से। आशय उद्देश्य, मकसद ।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ
सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कविता 'गाता खग्' से ली गई हैं जो कि
हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित है। कवि लहर और बुलबुले
के माध्यम से आत्मा-परमात्मा से संबंधित विचारों को व्यक्त कर रहा है।
व्याख्या - कवि कहता है कि
सरिता अथवा सागर की लहरें बार-बार उठती हैं और वायु का स्पर्श पाकर कांप उठती हैं।
लहरों की निरंतर गतिशीलता और कर्मशीलता के बावजूद उन्हें किनारा नहीं मिलता। जब
लहरें ऊपर उठती हैं, तब वे कभी-कभी अन्य
लहरों के कारण बिखर जाती हैं, तो कभी किनारों से
टकराकर चूर-चूर हो जाती हैं। लहरें और किनारे की अलग होने की भावना समाप्त नहीं
होती; किंतु उसी सरिता और सागर में लहरों के
घात-प्रतिघात सहता हुआ उनसे निकला एक बुलबुला अपने छोटे से सीमित अस्तित्व को उस
असीम जल राशि में समर्पित करके चुपचाप जीवन के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है
क्योंकि जीव का परमात्मा और शांत का अनंत को प्राप्त करना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य
माना गया है।
विशेष - (1) कवि की मान्यता है कि लहरें आपस में टकरा कर
अथवा किनारे से टकरा कर बिखर जाती हैं तथा किनारे से दूर चली जाती हैं परंतु उनमें
से निकला हुआ बुलबुला जल में विलीन हो कर अपने जीवन का उद्देश्य प्राप्त कर लेता
है।
(2) भाषा तत्सम प्रधान है। मानवीकरण तथा पुनरुक्ति प्रकाश
अलंकार हैं।
06
जड़ की मुसकान
पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या
1. एक दिन तने ने भी कहा था
जड़ ?
जड़ तो जड़ ही है;
जीवन से सदा डरी रही है,
और यही है उसका सारा इतिहास
कि जमीन से मुँह गड़ाए पड़ी रही है
लेकिन में जमीन से ऊपर उठा,
बाहर निकला,
मजबूत बना हूँ,
बढा हूँ
इसी से तो तना हूँ।
शब्दार्थ - जड़ - वृक्ष का मूल, जड़, निर्जीव। मुँह गड़ाए पड़ी रही - सबसे छिप कर
रहना। तना हूँ = वृक्ष का तना होना, अकड़ना, धमंड करना।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ हरिवंशराय बच्चन द्वारा रचित कविता 'जड़ की मुसकान' से ली गई हैं, जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित है, जिसमें कवि
ने वृक्ष के अस्तित्व में जड़ का महत्त्व स्पष्ट किया है।
व्याख्या - कवि लिखता है कि एक दिन तने ने जड़ के संबंध में कहा कि जड़ तो बिलकुल जड़
अर्थात् निर्जीव है। वह सदा जीवन से भयभीत रहती है। उसका सारा इतिहास यही है कि वह
सदा जमीन में ही मुँह गड़ा कर पड़ी रहती है, वह संसार से मुँह छिपा कर जमीन के अंदर छिपी रहती है,
किंतु तना स्वयं को जमीन से ऊपर उठा कर बढ़ता
हुआ बताता है, वह मजबूत बना हुआ
है इसलिए तना कहलाता है, वह तना हुआ अर्थात्
अकड़ा हुआ, घमंडी है।
विशेष - (1) तना स्वयं को जड़ से श्रेष्ठ बताता है तथा जड़
को सदा मुँह छिपा कर धरती में छिप कर रहने वाली कहता है।
(2) भाषा सहज, सरल है।
(3)
मानवीकरण और अनुप्रास अलंकार हैं।
2.
एक दिन डालों ने भी कहा था,
तना ?
किस बात पर है तना ?
जहां बिठाल दिया गया था वहीं पर है बना;
प्रगतिशील जगती में तिल भर नहीं डोला है,
खाया है, मोटापा है, सहलाया चोला है;
लेकिन हम तने से फूटीं,
दिशा-दिशा में गई
ऊपर उठीं,
नीचे आई
हर हवा के लिए दोल बनी, लहराई,
इसी से तो डाल कहलाई।
शब्दार्थ - बिठाल = बैठाया गया। प्रगतिशील = आगे बढ़ते रहने का भाव।
जगती दुनिया, संसार। तिल भर = जरा-सा, थोड़ा-सा। डोला हिला, गतिशील, आगे बढ़ा। सहलाया
चोला = सुविधा भोगी शरीर। दोल = हिलना। डाल = शाखा टहनी।
प्रसंग - यह काव्यांश हरिवंशराय बच्चन द्वारा रचित कविता 'जड़ की मुसकान' से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित
है। इसमें कवि ने वृक्ष के अस्तित्व में जड़ का महत्व स्पष्ट बताया है।
व्याख्या - कवि ने लिखा है कि एक दिन तने की बातें सुनकर पेड़ की डालियाँ भी बोलने लगों।
डाल ने कहा कि तना किस बात पर घमंड कर रहा है, क्योंकि उसे तो जहाँ बैठा दिया गया है, अभी भी वहीं पर बैठा है। इस निरंत गतिमान रहने
वाली दुनिया में वह जरा भी गतिशील नहीं हुआ है। वह खूब खा-खा कर मोटा हो गया है।
उसका शरीर सुविधा भोगी बन गया है किंतु हम डालियाँ उसी
तने से निकल कर अनेक दिशाओं में फैल गई हैं। डालियाँ ऊपर उठती हैं, नीचे भी आती हैं। हवा की हर लहर के साथ झूलती
हुई लहराती हैं, इसी से हम डाली
कहलाती हैं।
विशेष - (1) डाल स्वयं को गतिशील तथा तने को सुविधा भोगी
शरीर वाला तथा एक ही स्थान पर बैठा रहने वाला बताती है।
(2) भाषा सहज, सरल, भावपूर्ण है।
(3) अनुप्रास, मानवीकरण और पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार हैं।
3.
एक दिन पत्तियों ने भी कहा था,
डाल ?
डाल में क्या है कमाल ?
माना वह झूमी, झुकी, डोली है
ध्वनि-प्रधान दुनिया में एक शब्द भी वह कभी
बोली है ?
लेकिन हम हर-हर स्वर करती हैं
मर्मर स्वर मर्मभरा भरती हैं,
नूतन हर वर्ष हुई, पतझर में झर
बहार-फूट फिर छहरती हैं,
विथकित-चित पंथी का
शाप-ताप हरतीं हैं।
शब्दार्थ - कमाल = विशेषता, खास बात, खासियत। ध्वनि आवाज। हर-हर स्वर पत्तियों के
आपस में टकराने से उत्पन्न आवाज। मर्मर हरे पत्तों की खड़खड़ाहट। नूतन नई। विथकित
थका हुआ। चित्त = मन। पंथी = मुसाफिर। शाप-ताप परेशानी और गर्मी।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ हरिवंशराय बच्चन द्वारा रचित कविता 'जड़ की मुसकान' से ली गई हैं, जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक -10’ में संकलित है , जिसमें कवि ने वृक्ष के लिए जड़ के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।
व्याख्या - डालियों की बातें सुन कर एक दिन पत्तियों ने भी कहा कि डाल में भी भला कोई
विशेषता है ? हम मानती हैं कि वे झूमती हैं, झुकती हैं, हिलती हैं परंतु इस आवाज़ वाली दुनिया में क्या कभी
उन्होंने एक शब्द भी बोला है ? अर्थात् वे बिलकुल
नहीं बोलती हैं। इसके विपरीत पत्तियाँ कहती हैं कि वे सदा हर-हर का शब्द बोलती
रहती हैं। उनके आपस में टकराने से वातावरण उनकी खड़खड़ाहट की आवाज से भर जाता है।
हर वर्ष वे नया स्वरूप प्राप्त कर लेती हैं और पतझड़ में झड़ जाती हैं। वसंत के
आने पर वे फिर निकल आती हैं और डालियों पर छा जाती हैं। वे थके हुए मन वाले पथिकों
की परेशानियों तथा गर्मी को दूर कर उन्हें शांति प्रदान करती हैं।
विशेष - (1) पत्तियां स्वयं को डाल से श्रेष्ठ सिद्ध कर
अपनी छाया से पथिकों को विश्राम प्रदान करने वाली भी मानती हैं।
(2) भाषा सरल तथा भावपूर्ण है।
(3) मानवीकरण, अनुप्रास तथा पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार हैं।
4.
एक दिन फूलों ने भी कहा था,
पत्तियाँ ?
पत्तियों ने क्या किया ?
संख्या के बल पर बस डालों को छाप लिया,
डालों के बल पर ही चल चपल रही हैं,
हवाओं के बल पर ही मचल रही हैं
लेकिन हम अपने से खुले, खिले, फूले हैं-
रंग लिए, रस लिए, पराग लिए-भ्र
मरों ने आकर हमारे गुन गाए हैं, हम पर बौराए हैं।
हमारी यश-गंध दूर-दूर फैली है,
सबकी सुन पाई है,
जड़ मुसकराई है !
शब्दार्थ - छाप लिया = ढक लिया। चल-चपल चंचल, हिलती-डुलती। यश-गंध प्रशंसा रूपी सुगंध। बौराए = पागल होना;
होश खो देना।
प्रसंग - यह काव्यांश हरिवंशराय बच्चन द्वारा रचित कविता 'जड़ की मुसकान' नामक कविता से लिया गया है जो कि हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी
पुस्तक -10’ में संकलित है। इसमें कवि ने वृक्ष के अस्तित्व को जड़ पर निर्भर
बताया है।
व्याख्या - पत्तियों की बातें सुनकर एक दिन फूल भी बोला कि पत्तियों
ने भला किया ही क्या है ? अर्थात् पत्तियों
में तो कोई विशेषता ही नहीं है। पत्तियों ने तो केवल अपनी अधिक संख्या होने के
कारण केवल डालों को ही ढक लिया है। वे डालों के कारण ही हिल-डुल रही हैं और हवाओं
के कारण ही मचल रहीं हैं। किंतु हम फूल स्वयं ही खिले हैं और हमारे यश की सुगंध
दूर-दूर तक फैली हुई है। भँवरे भी आकर हमारे गुणों का गान करते हैं। वे हमारे ऊपर
मंडराते रहते हैं; वे हम पर पागल से
हो रहे हैं। इन सबकी बातों को सुनकर जड़ केवल मुसकराती है क्योंकि वह जानती है कि
यदि वह न होती तो तना, डाल, पत्तियाँ और फूल भी न होते। इन सब का अस्तित्व
जड़ के कारण ही है।
विशेष - (1) किसी भी भवन को बनाने में जैसे नींव का महत्त्व
होता है वैसे ही वृक्ष का महत्त्व उसकी जड़ से है,
यदि जड़ सलामत तो वृक्ष भी रहेगा।
(ii) भाषा सहज, सरल तथा भावपूर्ण है।
(iii) मानवीकरण, अनुप्रास तथा पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।